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निर्वाण कांड भाषा | Nirwankand Bhasha

आचार्य - वंदना | Aacharya Vandana

 


आचार्य - वंदना

श्री सिद्धभक्ति

अथ पौर्वाह्निक (अपराह्निक) आचार्य-वन्दना-क्रियायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण, सकल-कर्म-क्षयार्थं, भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतं श्रीसिद्धभक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहम। (९ बार णमोकार )

सम्मत्त-णाण-दंसण-वीरिय-सुहुमं तहेव अवगहणं।

अगुरुलहु-मव्वावाहं, अ_गुणा होंति सिद्धाणं॥ १॥

 

तवसिद्धे, णय-सिद्धे, संजम-सिद्धे, चरित्त-सिद्धे य।

णाणम्मि दंसणम्मि य, सिद्धे सिरसा णमंसामि॥ २॥

 

इच्छामि भंते। सिद्ध-भत्ति-काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं सम्म -णाण-सम्म-दंसण-सम्मचरित्त-जुत्ताणं, अ_विह-कम्म-विप्पमुक्काणं-अ_गुण-संपण्णाणं उड्ढलोय- मत्थयम्मि पइ_ियाणं तव-सिद्धाणं, णय-सिद्धाणं, संजम-सिद्धाणं,चरित्त-सिद्धाणं अतीदा-णागद-व_माण-कालत्तय-सिद्धाणं सव्वसिद्धाणं णिच्चकालं अंचेमि पुज्जेमि वंदामि, णमंसामि-दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगइ-गमणं समाहिमरणं जिणगुण संपत्ति होउ मज्झं।

श्री श्रुत भक्ति

अथ पौर्वाह्निक (अपराह्निक) आचार्य-वन्दना-क्रियायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण, सकलकर्मक्षयार्थं,भाव-पूजा-वन्दनास्तव-समेतं श्रीश्रुतभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहम। (९ बार णमोकार)

कोटिशतं द्वादश चैव कोट्यो, लक्षाण्यशीतिस्त्र््यऽधिकानि चैव।

पञ्चाश-दष्टौ च सहस्रसंख्यमेतच्छुतं पञ्चपदं नमामि॥ १॥

 

अरहंत-भासियत्थं-गणहर-देवेहिं गंथियं सम्मं

पणमामि भत्ति-जुत्तो, सुद-णाणमहोवहिं सिरसा॥ २॥

 

इच्छामि भंते ! सुदभत्ति-काउसग्गो कओ तस्सालोचेउं अंगोवंग-पइण्णय-पाहुडय-परियम्म-सुत्त पढमाणु-ओग-पुव्वगय-चूलिया चेव-सुत्तत्थय-थुइ-धम्म-कहाइयं णिच्च-कालं अंचेमि पुज्जेमि वंदामि णमंसामि-दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगइ-गमणं समाहि-मरणं जिणगुण-संपत्ति होउ-मज्झं।

श्री आचार्य भक्ति

अथ पौर्वाह्निक (अपराह्निक) आचार्य-वन्दना- क्रियायां, पूर्वाचार्यानुक्रमेण, सकलकर्मक्षयार्थं,भाव-पूजा-वन्दना स्तव-समेतं श्रीआचार्यभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहम। (९ बार णमोकार )

 

श्रुतजलधिपारगेभ्य:,स्व-पर-मतविभावना पटुमतिभ्य:।

सुचरित-तपोनिधिभ्यो, नमो गुरुभ्यो-गुण-गुरुभ्य:॥ १॥

 

छत्तीस-गुण-समग्गे, पञ्च-विहाचार-करण-संदरिसे।

सिस्सा-णुग्गह-कुसले, धम्मा-इरिये सदा वंदे॥ २॥

 

गुरु-भत्ति-संजमेण य, तरंति संसार-सायरं घोरम्।

छिण्णंति अ_कम्मं, जम्मण-मरणं ण पावेंति॥ ३॥

 

ये नित्यं-व्रत-मन्त्र-होम-निरता, ध्यानाग्नि-होत्राकुला:।

षट्कर्माभिरतास्-तपोधनधना:,साधु-क्रिया: साधव:॥४॥

 

शील-प्रावरणा-गुण-प्रहरणाश्-चन्द्रार्क-तेजोऽधिका:।

मोक्ष-द्वार-कपाट-पाटन-भटा:, प्रीणन्तु मां साधव:॥ ५॥

 

गुरव: पान्तु नो नित्यं ज्ञान-दर्शन-नायका:।

चारित्रार्णव गम्भीरा मोक्ष मार्गोपदेशका:॥ ६॥

 

इच्छामि भंते! आइरियभत्तिकाउसग्गो कओ, तस्सालोचेउं, सम्मणाण-सम्मदंसण-सम्मचरित्त-जुत्ताणं, पंंचविहाचाराणं, आइरियाणं आयारादि-सुद-णाणोवदेसयाणं उवज्झायाणं, ति-रयण-गुण-पालण-रयाणं सव्वसाहूणं, णिच्च-कालं, अंचेमि, पुज्जेमि, वंदामि, णमंसामि, दुक्ख-क्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाहो, सुगइ-गमणं-समाहिमरणं, जिणगुणसंपत्ति होउ मञ्झं।

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