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सरस्वती स्तोत्रं | Sarswati Stotra

 


सरस्वती स्तोत्रं

 

सरस्वत्या: प्रसादेन, काव्यं कुर्वन्ति मानवा:।

तस्मान्निश्चलभावेन, पूजनीया सरस्वती॥ 1॥

 

श्रीसर्वज्ञ-मुखोत्पन्ना, भारती बहुभाषिणी।

अज्ञानतिमिरं हन्ति, विद्या बहुविकासनी॥ 2॥

 

सरस्वती मया दृष्टा, दिव्या कमललोचना।

हंसस्कन्धसमारूढ़ा,वीणा-पुस्तकधारिणी॥ 3॥

 

प्रथमं भारती नाम, द्वितीयं च सरस्वती।

तृतीयं शारदा देवी, चतुर्थं हंसगामिनी॥ 4॥

 

पंचमं विदुषां माता, षष्ठं वागीश्वरि तथा।

कुमारी सप्तमं प्रोक्तं,अष्टमं ब्रह्मचारिणी॥ 5॥

 

नवमं च जगन्माता, दशमं ब्राह्मिणी तथा।

एकादशं तु ब्रह्माणी, द्वादशं वरदा भवेत्॥ 6॥

 

वाणी त्रयोदशं नाम, भाषाचैव चतुर्दशं।

पंचदशं च श्रुतदेवी, षोडशं गौर्निगद्यते॥ 7॥

 

एतानि श्रुतनामानि, प्रातरुत्थाय य: पठेत्।

तस्य संतुष्यति माता, शारदा वरदा भवेत्॥ 8॥

 

सरस्वती नमस्तुभ्यं, वरदे कामरूपिणी।

विद्यारम्भं करिष्यामि, सिद्धिर्भवतु मे सदा॥ 9॥

 

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