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निर्वाण कांड भाषा | Nirwankand Bhasha

उवासंग्गाहरम स्तोत्र | Uvasangharam Stotra

 

उवासंग्गाहरम स्तोत्र

उवसग्गहरं पासं, पासं वंदामि कम्म-घण मुक्कं ।

विसहर विस णिण्णासं, मंगल कल्लाण आवासं ।।१।।

 

विसहर फुलिंगमंतं, कंठे धारेदि जो सया मणुवो ।
तस्स गह रोग मारी, दुट्ठ जरा जंति उवसामं ।।२।।

 

चिट्ठदु दुरे मंतो, तुज्झ पणामो वि बहुफलो होदी ।
णर तिरियेसु वि जीवा, पावंति ण दुक्ख-दोगच्चं।।३।।

 

तुह सम्मत्ते लद्धे, चिंतामणि कप्पपायव सरिसे ।
पावंति अविग्घेणं, जीवा अयरामरं ठाणं ।।४।।

 

इअ संथुदो महायस!, भत्तिब्भरेण हिदयेण ।
ता देव! दिज्ज बोहिं, भवे भवे पास जिणचंद ।।५।।

 

ओं अमरतरु कामधेणु चिन्तामणि कामकुम्भमादिया |

सिरि पासणाह सेवाग्गहणे सव्वे वि दासततं ||६||

 

 

उवसग्गहरं त्थोतं, कादुणं जेण संघकल्लाणं |

करुणायरेण विहिदं, स भद्रबाहु गुरु जयदु ||७||

 

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